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Showing posts from October, 2019

बुत

माना विभाजित हो गये तुम परन्तु विसर्जन की बात तो सोचना भी मत , मेरे हृदय स्थल में बसने वाले वहीं हाड़ मांस की बुत हो तुम हां सिर्फ बुत! तो क्या हालांकि कोई फर्क नहीं बुत और मुरत में पर तुम्हारा बुत मुझमें धड़कता है पल- पल हर क्षण वो माटी की कोई मुरत नहीं कि गाजे-बाजे के साथ विदा कर दूं और फिर बिठा लूं एक नई वहीं माटी की मूरत हर्ष उल्लास के साथ ना- ना हरगिज नहीं.....

गलियारा

जैसे ही दिख जाऊं मैं उनको, महाशय मार्क जकरबर्ग निर्मित (मुखपुस्तिका) के किसी गली मुहल्ले में, थम जाते हैं उनके कदम जैसे काट दिया हो उनका रास्ता किसी काली बिल्ली ने, नजरें चुराते हैं इस कदर यकिनन डरते हैं कि आंखों में मेरे फिर से डूब ना जाए कहीं इसलिए ही शायद झट राह बदल लेते हैं अपनी या बंद कर देते हैं मेरी आज मेरा भी उन गलियों से गुजरना हुआ तो देखा उनके कदमों के निशान जो बढती जा रही है तो क्या मुझसे ही लुका छिपी और उस गलियारों में तारीफ की बधाई का खेल तो निरन्तर जारी है , फिर से उनके कदम बहक ना जाएं इसका ख्याल रखते हैं वो बखूबी पर मेरी समझ से परे है इक बात कि आखिर मैं भी उनकी तारीफ के कसीदे पढ़ लूं तो उनका क्या जाएगा जो मुझे नहीं देखना चाहिए क्या वो दिख जाएगा? या फिर मुझसे प्यार हो जाएगा।

याद तुम्हारी.........

अधूरे से हम गुम थे उसी ख्याल में कि ना करेगें याद तुम्हें , और तुम हो के जाते ही नहीं मन से मेरे, पलकें मूंदे ही थे कि बंद पलकों के किनारे से लुढकते नीर की बूंदे मुझे चिढ़ाते हुए अट्टहास करके जाने कितने सवाल करती रहती है मुझसे नहीं दे पाती हूं जवाब उसके किसी सवाल का हर सवाल नश्तर सा चुभता है और तुम्हारी यादें हैं कि मंडराती है इर्द गिर्द मेरे मन के जुगनुओं से जो धुंधली सी काली रातों में चमकता है और फिर छुप जाता है धूप में शाम को फिर चमकने के लिए और वही तुम्हारी यादों में अपने मोतियों सी पिरोये सपनों की लड़ियां एक- एक कर चमकाता है , दिखाता है वो सारे सपने जो कभी तुमने मेरे साथ मिलकर देखा था दृश्य वो सभी आंखों के सामने आते है जाते है कानों में वही मंदिर की घंटियों की टन -टन और मस्जिद के अजान के सुर का सुन्दर मधुर तरंग के घुले मिले आवाजों में जब हम भी घुल जाते थे.... देखो ! फिर दिखने लगे वो सारे दिवास्वप्न जाओ अब जाओ भी ना तुम्हें है अब मेरी जरूरत ना कोई दरकार तुम तो पूर्ण हो सभ्य, सामाजिक ,सम्पूर्ण हो रहने दो मुझे अपने मन से किए वादे पर अडिग ना डिगाओ मुझे ...

उम्रदराज..........

उम्र तो जैसे हाथों से रेत की तरह फिसलती रही, और हम अभी तक मुट्ठियां भिंचे अपनी , खुद पर इतराते रहे। जब निगाह आईने पर पड़ी आज , यकायक सफेद पड़े बाल और झुर्रिदार चेहरे ने पूछ डाला ; डरावना सा इक सवाल, हां तो बताओ इस बार का जन्म दिन कहां मनाओगे?

यशोधरा फिर अकेली

सत्य की खोज में निकल पड़े उस दिन सिद्धार्थ का अपनी सोती हुई यशोधरा एवं राहुल को अकेले छोड़ जाने के निर्णय से तुम मर्माहत हुए थे यशोधरा के अकेलेपन के दर्द से पीड़ा होती थी उसके परित्यक्ता कहलाने से तुम्हें तकलीफ होती थी कहा था ना तुमने कि , उसकी क्या गलती थी तो अब तुम्हीं बोलो ना एक सत्य; ना ,ना सही की खोज में तुम भी निकल पड़े फर्क बस इतना कि सत्य का पता तुम्हें मालूम था और तुम्हारे सही ग़लत के इस निर्णय से अनजान एक यशोधरा आज फिर अकेली रह गई उसके दर्द से क्यूं पीड़ा ना हुई तुम्हें? बोलो एक सत्य पर विजय पाकर दूसरे सत्य से मुंह मोड़ना क्या यही सत्य की खोज है ? क्या यही तुम्हारी जीत है?

बहाना

नित नए बहाने ढूंढते थे वो , मुझसे दूर जाने के खातिर, मिला ना कुछ बहाना तो, आखिर में आज तोहमत लगा दिया।

नज़रिया

जो सुहागनें होती है, वहीं पवित्र होती हैं, और जो कभी सुहागन हुआ करती थी, वो पतिता होती है, उनकी नजर में...........

मैं भी मीरा

हां ! मैं मीरा हूं, अपने मोहन की; उस मोहन की, जो कभी श्याम हुआ करता था, अपनी राधा का।

यादें मेरी......

तुम अपनी कसम निभाओ प्रिय मैं अपना धर्म निभाऊंगी तेरे मन के किसी इक कोने में वो यादें मेरी,जो बिखरी पड़ी रहने दें वहीं,वो यादें मेरी कुछ धुंधली सी, कुछ मुड़ी-तुड़ी तुम क्यों डरते रहते मुझसे? ना पास कभी अब आऊंगी जब पार क्षितिज के जाऊंगी तब साथ उसे ले जाऊंगी तुम अपनी कसम निभाओ प्रिय… मैं अपना धर्म निभाऊंगी।

जीवन सार

कर्म के पथ पर चलते-चलते जाना नभ के पार राख बनके मिल जाना जल में क्या यही है जीवन सार?