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एक उम्मीद सी है बस_____

मैं अपने ईश्वर में विश्वास रखती हूं और मेरा मन  अक्सर कहता है कि तुम एक दिन मुझसे दोबारा मिलोगे एक उम्मीद सी है और उम्मीद कभी भी छोड़नी नहीं चाहिए; है ना उस दिन तुम्हारा  अचानक से मुझसे ऐसे ही बिना किसी बात के मुझसे मुंह मोड़ना बात कुछ समझ में नहीं आई  तुम्हारा यूं चले जाना दूर  फिर कभी वापस  नहीं आने के लिए वो हमारी  आखिरी मुलाकात तो नहीं हो सकती; ना  एक उम्मीद है कि  हम फिर मिलेंगे ,और उम्मीद कभी छोड़नी  नहीं चाहिए ,है ना !  जैसे पृथ्वी अपनी संतुलन  बनाए रखना जानती है  और फिर लील लेती है  कई जिंदगियां लेकिन अपना संतुलन बिगड़ने  नहीं देती शायद वही संतुलन  तुमने भी बनाया होगा  अपनी जिंदगी में  लील ली मेरी खुशियां  जो तुम्हारे दिल के रास्ते  होकर गुजरती थी कभी  जैसे तराजू में पड़े एक पलड़े में वज़न  ज्यादा होने से संतुलन बिगड जाता है और  दूसरे पलड़े से निकालते ही  पलड़ा बराबर हो जाता हो , ठीक वैसे ही तुम्हारे रिश्ते बराबर हो गए ! है ना पर तुम्हीं बताओ भला ऐसे विकट समय में...

वर्ग विशेष_____

देखा है कई  बुद्धिजिवियों को जो बातें करते हैं  बड़ी- बड़ी करके स्याही का  उपयोग ; रंग देते हैं  पन्ने कोरी दिवस चाहे हो कोई  पर्यावरण दिवस, प्रेम दिवस मातृ दिवस,  मजदूर दिवस चाहे हो नारी दिवस अपनी लेखनी से करके अचंभित देते हैं राय अपनी पंछी, पेड़, धरती, अम्बर, जानवरों पर  इतना प्यार दर्शाते हैं,  काश! होता उतना ही प्यार  उन्हें ज़िन्दा इन्सानों से भी जब बारी आती है कुछ कर गुजरने की सच कहने की किसी को उसका  हक दिलवाने की  तो उतार कर मुखौटा  अपना छुप जातें है  पीछे परदे के  बारी-बारी  और अवतरित  होते हैं तब जब महफ़िल हो सजी  बिकाऊ पुरस्कारों में पर्ची लगी हो  उनके नामों की ,साथ हो  फूलों की लड़ी  और हाॅल हो कुछ मुखौटाधारी मेहमानों से भरी -भरी तब दिख जाते हैं कितने ही बुद्धिजीवी माइक पकड़ कर चिखते चिल्लाते बातें करते बहुत सारी बड़ी-बड़ी..........

# (रिश्ते)

रिश्ते बनाए तो बड़ी आसानी से  जाते हैं , लेकिन निभाने में बहुत  मुश्किल होती है,  ओस की बूंद सी जाड़े की धूप सी जैसे कई सारे मिलते हैं  उसे नाम पर फिर भी  वो खास रिश्ता  अनाम हो जाता है  उनकी नज़र में , कायर होते हैं वो  जो बड़ी आसानी से  एक खुबसूरत रिश्ते को बदनाम करने की  साज़िश रचते हैं  ओढ़ कर समाज के डर का ओछा सा लबादा  अब अपने धर्म का  निर्वाह करते हैं  खुद हो जाते हैं गुमनाम, लगा कर कलंक  करके उसको बदनाम, खुद को करके पाक साफ उन जैसों के लिए ही  ख़ास रिश्ते हराम होते हैं  मुकर जाने से उसके रिश्ते अनाम हो गए पूछो तो कभी उनसे जो जीते हैं बड़ी ही शिद्दत से इस आधे  अधूरे से रिश्ते को  उनके लिए यह  आधा सा रिश्ता ही उनकी जिंदगी  तमाम होती है रिश्ते कभी अनाम  नहीं होते, हो जाते हैं बेनाम वो जो  इस रिश्ते में बदनाम होते हैं______

शायद......

शायद...... सालों से टूटी पड़ी हूं मैं आज की तारीख में डरी हूं फिर भी सब कहते है बहुत मजबूत हूं मैं अब भी हो नहीं पाती मुझसे अपने लिए कुछ मनमर्जियां ना रूठती हूं ना मना पाती हूं खुद को ना करती हूं जिद कुछ अपने लिए फिर भी सब कहते हैं बहुत मजबूत हूं मैं डरती हूं तब भी जब बालों में सफेदी दिख जाती है कभी नजर आ जाती चेहरे पर झलकती झुर्रियां बदन के बढ़ते ताप से माथे पर टीसती पीड़ा से नहीं कर पाती मुकाबला शरीर के इन चालाक दुश्मनों से फिर भी सब कहते हैं बहुत मजबूत हूं मैं जब घर के पंखे खराब होते हैं होने लगती है बेचैनी बारी जब नये गैस के सिलेंडर लगाने की आती है तब कांप जाती है रुह मेरी जब काम एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर में चक्कर लगाने का हो तब सोच में पड़ जाती हूं फिर भी सब कहते हैं बहुत मजबूत हूं मैं करती आई हूं निर्वाह अपने बच्चों का अपने दम पर लेकिन थक जाती हूं बहुत जब शाम ढलती है रात गहराती है तब तन्हाई डराती है फिर भी सब कहते हैं बहुत मजबूत हूं मैं......…शायद

विगत दिवस

सैंकड़ों दिवस फिर बीत गए, मेरे इस प्रण को किये हुए जब ठाना था मन में मैंने कि यादें तुम्हारी मैं आने ना दूंगी बस कर्म की भट्टी में जलती रहुंगी मन को मिले मेरे जितने घाव हैं तु...

धड़कन..........

कुछ दिनों पहले तक लगता था ,यूं मुझको कि ,मैं ही इक जा़न हूं उनकी और मेरा दिल भी तो! उनकेे सीने में धड़क कर अपनी हाजिरी हर पल वहीं की लगवा रहा था लेकिन ;वक्त वे वक्त अब दिखने लगा है ...

बुत

माना विभाजित हो गये तुम परन्तु विसर्जन की बात तो सोचना भी मत , मेरे हृदय स्थल में बसने वाले वहीं हाड़ मांस की बुत हो तुम हां सिर्फ बुत! तो क्या हालांकि कोई फर्क नहीं बुत और मुरत में पर तुम्हारा बुत मुझमें धड़कता है पल- पल हर क्षण वो माटी की कोई मुरत नहीं कि गाजे-बाजे के साथ विदा कर दूं और फिर बिठा लूं एक नई वहीं माटी की मूरत हर्ष उल्लास के साथ ना- ना हरगिज नहीं.....