विगत दिवस

सैंकड़ों दिवस फिर बीत गए,
मेरे इस प्रण को किये हुए
जब ठाना था मन में मैंने
कि यादें तुम्हारी मैं आने ना दूंगी
बस कर्म की भट्टी में जलती रहुंगी
मन को मिले मेरे जितने घाव हैं तुमसे
चाहे वो अब भले ना भरें ,
पर यादें तुम्हारी मिटा के रहूंगी
पर ! ये दो आंखें मेरी
निरीह सी निर्बल सी मौन ही
इसका क्या ; ये तो जैसे
बेमौसम की बारिश हो
इनके लिए दिन क्या ,रात क्या
ग्रीष्म क्या, बरसात क्या
शाय़द ठान लिया है इसने भी
मेरी बात वो ना मानेंगे
खुद तरसेंगे और मुझे भी
विगत क्षणों की भांति फिर
प्रत्येक दिवस तड़पायेंगे ,रूलायेंगे.....

Comments