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विगत दिवस

सैंकड़ों दिवस फिर बीत गए, मेरे इस प्रण को किये हुए जब ठाना था मन में मैंने कि यादें तुम्हारी मैं आने ना दूंगी बस कर्म की भट्टी में जलती रहुंगी मन को मिले मेरे जितने घाव हैं तु...