यादें मेरी......
तुम अपनी कसम निभाओ प्रिय
रहने दें वहीं,वो यादें मेरी
कुछ धुंधली सी, कुछ मुड़ी-तुड़ी
तुम क्यों डरते रहते मुझसे?
ना पास कभी अब आऊंगी
जब पार क्षितिज के जाऊंगी
तब साथ उसे ले जाऊंगी
तुम अपनी कसम निभाओ प्रिय…
मैं अपना धर्म निभाऊंगी।
मैं अपना धर्म निभाऊंगी
तेरे मन के किसी इक कोने में
वो यादें मेरी,जो बिखरी पड़ीरहने दें वहीं,वो यादें मेरी
कुछ धुंधली सी, कुछ मुड़ी-तुड़ी
तुम क्यों डरते रहते मुझसे?
ना पास कभी अब आऊंगी
जब पार क्षितिज के जाऊंगी
तब साथ उसे ले जाऊंगी
तुम अपनी कसम निभाओ प्रिय…
मैं अपना धर्म निभाऊंगी।
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